जयपुर / चेतन ठठेरा । राजस्थान की सरकार और ब्यूरोक्रेट्स के आदेश कई बार ऐसे अजीबोगरीब होते हैं कि उन पर प्रदेश के कम पढ़े लिखे इंसान को भी हंसी आ जाए। ऐसा ही एक आदेश सरकार और शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने निकला है जिस पर प्रदेश का आमजन ही नहीं कम पढ़ा लिखा इंसान भी हंस रहा है यही नहीं यह आदेश से सरकार और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के लिए एक मुसीबत भी बन गया है ।
प्रदेश में सरकारी स्कूलों के साथ ही निजी स्कूलों में भी नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। सरकारी स्कूलों में अभिभावकों और विद्यार्थियों का रुझान बढ़ाने तथा स्कूलों का नामांकन बढ़ाने के लिए सरकार कई तरह की लाभान्वित योजनाएं चल रही है और बच्चों के नामांकन बढाने के साथ ही बच्चों का ठहराव निश्चित करने के लिए संस्था प्रधान से लेकर शिक्षकों तक की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई है।
सरकार सरकारी स्कूलों में नामांकन और ठहराव के लिए निशुल्क यूनिफॉर्म, पोषाहार, दूध,साइकिल, टैबलेट और कई तरह की छात्रवृतियां दे रही है ताकि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढे और अभिभावकों का रुझान सरकारी स्कूलों की ओर हो लेकिन सरकार के यह सारे प्रयास हाल ही में प्रारंभिक शिक्षा निदेशक सीताराम जाट के एक आदेश से फेल साबित हो रहे हैं।
शिक्षा निदेशक जाट में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले एक आदेश निकाला जिसमें बताया गया है कि राजकीय स्कूलों में कक्षा एक में प्रवेश के लिए 6 से 7 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित की है आरटीई दिशा निर्देश 2024-25 के अनुसार राजकीय एवं गैर राजकीय विद्यालय में कक्षा एक में होने वाले प्रवेश के लिए 6 -7 वर्ष आयु वर्ग के बालक बालिका ही पात्र होंगे इससे कम उम्र के बालक बालिकाओं को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इस आदेश के संबंध में उन्होंने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देशित किया है ।
अब शिक्षा निदेशक प्रारंभिक सीताराम जाट ने यह आदेश शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की सहमति से ही निकला होगा। बिना मंत्री दिलावर की सहमति के तो आदेश नहीं निकल सकता। दूसरी और प्रदेश में संचालित निजी स्कूलों तथा मिशनरी स्कूलों में तीन से चार साल के बच्चों को ही प्रवेश दिया जा रहा है और दिया जाता है तथा निजी स्कूलों में एलकेजी यूकेजी केजी प्ले ग्रुप नर्सरी जैसी व्यवस्थाएं है और इनमें बच्चे तीन से चार साल तक की उम्र में प्रवेश दिया जाता है और जब कक्षा एक तक पहुंचता तब तक उसकी आयु 6 साल हो जाती है ।
लेकिन सरकारी स्कूलों में एलकेजी यूकेजी केजी प्ले ग्रुप नर्सरी जैसे विकल्प नहीं है । ऐसे में अभिभावक अपने तीन से चार साल के बच्चे को निजी स्कूलों में प्रवेश दिलाते हैं और जब एक बार बच्चा निजी स्कूलों में प्रवेश लेकर स्कूल के माहौल में ढल जाता है तो फिर उसका उसे उस स्कूल से पहली कक्षा में प्रवेश के लिए स्कूल से निकाल कर सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलाना अभिभावकों को मंजूर नहीं होता और इसके लिए बच्चा भी तैयार नहीं होता है।जब सरकार को आयु निर्धारित वाला यह आदेश लागू करना है तो इसे निजी और मिशनरी स्कूलों पर भी सख्ती से लागू किया जाए।
तब तो सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ेगा अन्यथा सरकार का यह आयु निर्धारित वाला आदेश सरकार के लिए फेल होकर निजी स्कूलों और मिशनरी स्कूलों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है । ऐसे में सरकारी स्कूलों के संस्था प्रधान और शिक्षकों की कार्य कुशलता और कार्य क्षमता को नामांकन बढ़ाने में लगाना भी व्यर्थ है।