बाल विवाह से मुक्ति हेतु समाज प्रशासन और विधिक संस्थाओं का सामूहिक प्रयास ही आशा की किरण : दिनेश कुमार जलुथरिया

दिनेश कुमार जलुथरिया ने बाल विवाह को केवल सामाजिक समस्या नहीं बल्कि एक गंभीर अपराध बताते हुए कहा कि इसके उन्मूलन के लिए समाज, प्रशासन और विधिक संस्थाओं का सामूहिक प्रयास आवश्यक है। उन्होंने विशेष रूप से नालसा आशा (जागरूकता, सहयोग, सहायता और कार्रवाई) मानक संचालन प्रक्रिया 2025 का उल्लेख करते हुए बताया कि यह योजना बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 एवं किशोर न्याय अधिनियम 2015 के कानूनी ढांचे के बारे में जागरूकता बढ़ाने, संवेदनशील समूहों को सशक्त बनाने और पीडि़त बच्चों के पुनर्वास हेतु एक संस्थागत ढांचा तैयार करने का लक्ष्य रखती है
बाल विवाह से मुक्ति हेतु समाज प्रशासन और विधिक संस्थाओं का सामूहिक प्रयास ही आशा की किरण : दिनेश कुमार जलुथरिया
कार्यशाला की अध्यक्षता जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दिनेश कुमार जलुथरिया एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी परशुराम धानका ने संयुक्त रूप से की।

टोंक। जिला कलेक्ट्रेट सभागार टोंक में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं जिला बाल संरक्षण इकाई, बाल अधिकारिता विभाग द्वारा बाल विवाह रोकथाम हेतु एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला की अध्यक्षता जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दिनेश कुमार जलुथरिया एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी परशुराम धानका ने संयुक्त रूप से की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में दिनेश कुमार जलुथरिया ने बाल विवाह को केवल सामाजिक समस्या नहीं बल्कि एक गंभीर अपराध बताते हुए कहा कि इसके उन्मूलन के लिए समाज, प्रशासन और विधिक संस्थाओं का सामूहिक प्रयास आवश्यक है।

उन्होंने विशेष रूप से नालसा आशा (जागरूकता, सहयोग, सहायता और कार्रवाई) मानक संचालन प्रक्रिया 2025 का उल्लेख करते हुए बताया कि यह योजना बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 एवं किशोर न्याय अधिनियम 2015 के कानूनी ढांचे के बारे में जागरूकता बढ़ाने, संवेदनशील समूहों को सशक्त बनाने और पीडि़त बच्चों के पुनर्वास हेतु एक संस्थागत ढांचा तैयार करने का लक्ष्य रखती है। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णय सोसाइटी ऑफ एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम भारत संघ (2024) में बाल विवाह रोकथाम और पीडि़तों के पुनर्वास हेतु व्यापक दिशा-निर्देश दिए गए हैं, जिनका अनुपालन करना हमारी जिम्मेदारी है।

दिनेश कुमार जलुथरिया ने यह भी कहा कि आशा इकाई वास्तव में उन बच्चों और परिवारों के लिए आशा की किरण है जो इस समस्या से प्रभावित हैं। महत्वपूर्ण रूप से जलुथरिया ने कार्यशाला में उपस्थित सभी प्रतिभागियों को बाल विवाह न करने की शपथ दिलाई और यह सुनिश्चित किया कि सभी हितधारक बाल विवाह न कराए जाने के लिए प्रतिबद्ध एवं पाबंद रहें। साथ ही उन्होंने निर्देश दिया कि आगामी 100 दिवसीय कार्य योजना का पालन सुनिश्चित किया जाए और सभी विभाग अपने-अपने स्तर पर ठोस कार्यवाही करें। कार्यशाला में जिला बाल संरक्षण इकाई (टोंक) सहायक निदेशक नवल खान ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 के प्रावधानों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि अधिनियम के अंतर्गत बाल विवाह को संज्ञेय एवं गैर-जमानती अपराध माना गया है और धारा 9, 10 एवं 11 के अंतर्गत नाबालिग लडक़ी से विवाह करने वाले पुरुष, अभिभावक, रिश्तेदार, विवाह कराने वाले बिचौलिये, खानपान एवं अन्य सेवा प्रदाताओं को दंडित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 3 के अनुसार बाल विवाह को शून्य घोषित करवाने हेतु पीडि़त बालक या बालिका न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं। खान ने कहा कि बाल विवाह रोकथाम केवल कानून का पालन नहीं बल्कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है और इसके लिए जिला प्रशासन, पुलिस, पंचायत राज संस्थाएं तथा शिक्षा विभाग को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।

इस अवसर पर मुख्य कार्यकारी अधिकारी परशुराम धानका ने पंचायत राज संस्थाओं की भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायतों एवं पंचायत समितियों को सक्रिय कर बाल विवाह रोकथाम हेतु जनजागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। ग्राम सभाओं में बाल विवाह निषेध अधिनियम की जानकारी दी जानी चाहिए और बालिकाओं का विद्यालयों में नियमित दाखिला सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ब्लॉक एवं ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों को सक्रिय कर बाल विवाह, बाल तस्करी एवं बाल उत्पीडऩ पर रोकथाम संबंधी कार्य किए जाएं। श्री धानका ने विशेष रूप से कहा कि बाल विवाह मुक्त ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहित करना हमारी प्राथमिकता है और समाज तभी आगे बढ़ेगा जब बालिकाएं शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनें। धार्मिक प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे।

पं. पवन सागर ने कहा कि धर्म और परम्परा का सही अर्थ समाज की भलाई है, न कि बच्चों के अधिकारों का हनन। किसी भी धार्मिक अवसर पर बाल विवाह को बढ़ावा देना धर्म के सिद्धांतों के विपरीत है और समाज को इसे रोकने के लिए एकजुट होना चाहिए। मौलवी हनीफ नदवी ने कहा कि इस्लाम में शिक्षा और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। बाल विवाह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है और समाज को चाहिए कि धार्मिक और सामाजिक स्तर पर मिलकर इसे समाप्त करने का प्रयास करे।

धर्म कभी भी अन्याय और शोषण को स्वीकार नहीं करता। कार्यशाला में अनेक विभागों एवं संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे जिनमें प्रमुख रूप से बाल कल्याण समिति अध्यक्ष हेमराज चौधरी, बाल कल्याण समिति सदस्य शेफाली जैन, शाहीन हबीब, संदीप कांटिया, किशोर न्याय बोर्ड सदस्य सत्यनारायण शर्मा, कोषाधिकारी हरीश कुमार, मानव तस्करी विरोधी इकाई टोंक देवेंद्र सिंह राठौड़, श्रम विभाग मूलचन्द्र, आबकारी विभाग ओमप्रकाश, कमलेश सैनी बाल सहायता हेल्पलाइन टोंक, प्रवीण कुमार भारद्वाज बाल निरीक्षण गृह, मीरा चौधरी, रामेश्वर डूडी, नरेश मीना, ममता शर्मा,

सविता गुर्जर, भावना सक्सेना, अरुणा शर्मा, मंजू चौधरी, आशा शास्त्री, सरोज मीना, प्रज्ञा मोटवानी, महन्त सुरेश दुबे, मौलाना आदिल खान नदवी, पूनम जोनवाल समन्वयक, शिव शिक्षा समिति रानोली, मेरिंगटन सोनी महिला अधिकारिता विभाग सहित अनेक सामाजिक एवं धार्मिक प्रतिनिधि सम्मिलित रहे।

कार्यशाला के अंत में सभी उपस्थित हितधारकों ने बाल विवाह रोकथाम हेतु सामूहिक संकल्प लिया और आगामी 100 दिवसीय कार्य योजना पर सहमति व्यक्त की। यह कार्यशाला बाल विवाह उन्मूलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई, जिसमें विधिक संस्थाओं, प्रशासनिक अधिकारियों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर बच्चों के अधिकारों की रक्षा हेतु ठोस रणनीति तैयार की।

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