जातिगत सूचक अपराध को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

आदेश से आमजन को राहत
जातिगत सूचक अपराध को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

जयपुर / डॉ. चेतन ठठेरा।‌सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी निजी घर की चारदीवारी या बंद कमरे के भीतर, जहां कोई बाहरी व्यक्ति (पब्लिक) मौजूद न हो, जातिसूचक शब्द कहना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।‌ सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से और फैसले से आम जनता को राहत मिलेगी।

 

अदालत के अनुसार, इस अधिनियम की धाराओं को लागू करने के लिए अपमानजनक टिप्पणी का “सार्वजनिक दृष्टिकोण” (Public View) में होना अनिवार्य कानूनी शर्त है।

 

फैसले के मुख्य बिंदुपब्लिक व्यू की अनिवार्यता

 

SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तभी बनता है जब घटना किसी ऐसी जगह हो जो आम जनता की नजर में हो या जहां बाहरी लोग उसे सुन-देख सकें।

 

गवाहों की अनुपस्थिति

 

यदि बंद कमरे या निजी कार्यालय में हुई बहस के दौरान कोई बाहरी गवाह मौजूद नहीं था, तो वहां कही गई बातें इस विशेष कानून के दायरे में नहीं आएंगी।

 

जातिगत अपमान की नीयत

 

सिर्फ गाली-गलौज करना इस एक्ट के तहत मामला दर्ज करने का आधार नहीं है, बल्कि पीड़ित को उसकी जाति के कारण ही जानबूझकर अपमानित करने का इरादा साबित होना चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि भले ही SC/ST एक्ट की धाराएं हटा दी जाएं, लेकिन सामान्य आपराधिक कानूनों (जैसे भारतीय न्याय संहिता/IPC की धाराएं) के तहत मामला चलता रहेगा।

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