भीलवाड़ा नगर निगम में महापौर को लेकर फंसा पेज

भीलवाड़ा। भीलवाड़ा नगर निगम में पार्षदों के चयन को लेकर चुनाव की प्रक्रिया के तहत मतदान प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है। चुनाव में 64% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान के बाद मतदाताओं के मताधिकार के प्रयोग का आंकलन से राजनीतिक समीकरणों के आधार पर भीलवाड़ा नगर निगम में भाजपा बहुमत हासिल कर लेगी ? लेकिन नगर निगम का महापौर बनाने को लेकर पेच फंसा हुआ है। मतदान के नतीजे से पहले ही महापौर की कुर्सी को लेकर सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। भाजपा ने सभी 70 वार्डो में अपने प्रत्याशी उतारे जबकि कांग्रेस केवल 53 वार्डों में ही अपने प्रत्याशी उतर पाई और बड़ी संख्या निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों ने चुनाव मैदान में उतर कर मुकाबला पेचीदा बना दिया है। ऐसी स्थिति में असली खेल अब केवल जीत का नहीं बल्कि महापौर बनने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने का है।
क्या ब्राह्मण महिला बनेगी महापौर ?
भीलवाड़ा की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या महापौर की कुर्सी इस बार किसी ब्राह्मण महिला के हिस्से आएगी? भाजपा के भीतर महिला चेहरों को लेकर पहले से ही चर्चा और खींचतान सामने आ चुकी है। टिकट वितरण को लेकर महिला पदाधिकारियों के विरोध ने भी संकेत दिया था कि पार्टी के भीतर दावेदारियों को लेकर मुकाबला आसान नहीं है।
ब्राह्मण महापौर क्यों ?
सियासी गलियारे व आमजन में चर्चाओं का दौर है कि भीलवाड़ा सांसद वैश्य वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जबकि शहर विधायक महाजन वर्ग से हैं और जिले में भाजपा के सभी विधायकों में से मात्र एक विधायक मांडलगढ़ से गोपाल लाल खंडेलवाल शर्मा ब्राह्मण विधायक हैं जबकि भीलवाड़ा शहर और जिले में मतदाताओं के अनुपात से ब्राह्मण मतदाता सर्वाधिक है और इसी गणित को लेकर यह चर्चा है कि नगर निगम भीलवाड़ा में सामान्य महिला का पद होने से इस बार आने वाले चुनावों को मध्य नजर रखते हुए भाजपा किसी ब्राह्मण महिला चेहरे को महापौर बना सकती है ? क्योंकि अब तक भीलवाड़ा शहर में समीकरण रहे हैं कि अगर विधायक ब्राह्मण वर्ग से हैं तो सांसद महाजन वर्ग से और नगर निगम से पहले नगर परिषद में अध्यक्ष महाजन वर्ग से रहा। कुल मिलाकर भीलवाड़ा में राजनीतिक क्षेत्र में एक पद ब्राह्मण वर्ग के पास रहता आया है और इसी समीकरण को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। लेकिन अंतिम तस्वीर चुनाव परिणाम और बोर्ड के वास्तविक संख्या-बल के बाद ही साफ होगी।
महापौर की दौड़ में कौन-कौन है शामिल
सुमन ओझा, खुशबू शुक्ला, रीता जोशी, पूर्णिमा जैन, सुनीता कटारिया प्रमुख है
अग्रवाल, कोठारी या अवस्थी—कौन पड़ेगा भारी ?
महापौर की दौड़ को लेकर सांसद अग्रवाल, निर्दलीय विधायक कोठारी और पूर्व विधायक अवस्थी के समर्थकों के नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग समीकरणों की चर्चा है।सवाल यह नहीं कि किसका राजनीतिक कद बड़ा है, बल्कि सवाल यह है कि किसके पास पार्षदों का समर्थन जुटाने की सबसे मजबूत क्षमता होगी।
यह है सियासत में गणित महापौर को लेकर
सांसद दामोदर अग्रवाल अपने राजनीतिक कद के आधार पर दमखम दिखने में सफल रहे तो उनके गुट से सुमन ओझा सबसे प्रबल दावेदार है। ओझा राजनीतिक समीकरण और जोड़-तोड़ में सबसे मजबूत महापौर के लिए दावेदार हैं।
निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी जिस तरह की सियासत उन्होंने अभी चुनाव से पहले की है उस आधार पर अगर वह अपने खेमे से महापौर बनाने के लिए अडे तो खुशबू शुक्ला का नाम आगे कर सकते हैं लेकिन ऐसी संभावनाएं फिलहाल कम नजर आती है। अब बात करें पूर्व विधायक विट्ठल शंकर अवस्थी के गुट की उनके गुट से वह पूर्णिमा जैन (पोखरणा) का नाम आगे कर सकते हैं। पूर्णिमा जैन को भाजपा के वरिष्ठ कद्दावर नेता एवं महामहिम राज्यपाल संगीत की एक लॉबी का वरदहस्त है। अब कौन सबसे अधिक पार्षदों का समर्थन जुटा पाता है यह इस पर निर्भर करेगा।
निर्दलीय प्रभावित कर सकते हैं समीकरण
इस चुनाव में निर्दलीयों की बड़ी संख्या ने पूरा गणित बदल दिया है। भाजपा व कांग्रेस के बागी और निर्दलीय उम्मीदवार कई वार्डों में पार्टी के समीकरण प्रभावित कर रहे हैं।
यही वजह है कि 14 सितंबर को आने वाले नतीजों के बाद असली ‘महापौर मैजिक’ शुरू होने की संभावना है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार महापौर का चुनाव 21 सितंबर को होना है।
2019 का संशोधन फिर दोहराया जाएगा?
अब दूसरा बड़ा सवाल 2019 में हुए संशोधन की प्रक्रिया को लेकर है। क्या इस बार भी नियमों/प्रक्रिया में कोई ऐसा मोड़ आएगा, जो महापौर चुनाव के मौजूदा समीकरण को बदल दे? सबसे पहले जानते हैं 2019 में संशोधन का मामला क्या है। प्रदेश में 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एक संशोधन किया था इस संशोधन के तहत बिना पार्षद का चुनाव लड़े कोई भी प्रत्याशी जिसे पार्टी चाहे उसे नगर निगम का महापौर, नगर परिषद में सभापति और नगर पालिका में अध्यक्ष बना सकती है और 6 महीने की अवधि के अंदर उसे पार्षद का चुनाव लड़ा सकती है ऐसा प्रयोग इस संशोधन के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जयपुर में ग्रेटर में किया था सौम्या गुर्जर को महापौर बनाकर लेकिन और कहीं इसका प्रयोग नहीं किया। परंतु सरकार बदलने के बाद भाजपा सत्ता में आई लेकिन भाजपा ने भी सत्ता में आने के बाद इस संशोधन में कोई बदलाव नहीं किया और उसे यथावत रखा। ऐसी स्थिति में आज राजनीतिक समीकरण पर परिस्थितियों कुछ बिगड़ती है तो भाजपा इसी संशोधन का प्रयोग करते हुए महापौर बना सकती है।
2019 का संशोधन दोहराया जाता है तो कौन हो सकता महापौर
अगर भीलवाड़ा नगर निगम में महापौर के चुनाव के लिए 2019 का संशोधन दोहराया जाता है तो ऐसी स्थिति में महापौर के लिए भाजपा के पास विकल्प के रूप में नगर विकास न्यास के पूर्व अध्यक्ष एवं राजस्थान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री के खास एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामपाल शर्मा की पत्नी और कांफेड प्रदेश अध्यक्ष मोना शर्मा का नाम सबसे आगे है। वह सभी समीकरण में समाहित है। ब्राह्मण वर्ग से हैं लंबा राजनीतिक अनुभव और विट्ठल शंकर अवस्थी के विरोधी गुट के लिए अवस्थी को राजनीति से बिल्कुल किनारे करने का एक सुनहरा मौका है। मोना शर्मा के पति रामपाल शर्मा को भीलवाड़ा का राजनीतिक चाणक्य भी कहा जाता है और इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है ऐसी चर्चा राजनीतिक गलियारे में और शहर के बुद्धिजीवी वर्ग में है।
फिलहाल इसे लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन 2019 की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति हुई तो महापौर की दौड़ का पूरा गणित बदल सकता है।
बाड़ेबंदी ने बढ़ाई बेचैनी,
क्या अपनों पर भरोसा नहीं?
सबसे ज्यादा चर्चा बाड़ेबंदी को लेकर है। चुनाव मतदान प्रक्रिया के बाद मतदान के आंकड़ों को लेकर राजनीति के गणितज्ञों के अनुसार भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है और भाजपा के नेता भी अपने बयानों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं तो फिर कल अर्थात बुधवार को मतदान समाप्त होने के बाद देर रात को भाजपा के सभी 70 पार्षदों को तीन लग्जरी एसी बसों के माध्यम से अज्ञातवास में रवाना कर दिया गया। भाजपा नेताओं के बयानों के अनुसार अगर भाजपा बोर्ड बनाने की स्थिति में है तो फिर भाजपा के प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी क्यों ?
यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है—
क्या भाजपा को अपने ही पार्षदों पर भरोसा नहीं है?
या फिर पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि निर्दलीय पार्षदों और संभावित क्रॉस-वोटिंग के चलते अंतिम समय में समीकरण बदल सकते हैं?
निर्दलीय विधायक अशोक कोठारी की ओर से अपने समर्थित 24 प्रत्याशियों से महापौर चुनाव में खरीद-फरोख्त से दूर रहने का स्व-घोषणा पत्र भरवाया भी गया था। महापौर चुनाव को लेकर अभी से शक्ति प्रदर्शन और नैतिक दबाव की राजनीति शुरू हो चुकी है।
अब नजर 14 सितंबर पर…
14 सितंबर को जब ईवीएम खुलेगी तो केवल पार्षद नहीं जीतेंगे—महापौर की कुर्सी के दावेदारों की पहली परीक्षा भी शुरू होगी।
किसके पास कितने पार्षद होंगे?
कौन निर्दलीयों को साध पाएगा?
कौन अपने खेमे को एकजुट रख पाएगा?
क्या भाजपा आसानी से अपना महापौर बना पाएगी या निर्दलीय निर्णायक भूमिका निभाएंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या भीलवाड़ा को पहली बार ब्राह्मण महिला महापौर मिलेगी ?
फिलहाल महापौर की कुर्सी खाली है, लेकिन उसके लिए सियासी शतरंज की बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है। अब बाजी किसके हाथ लगेगी, इसका फैसला जनता के जनादेश के बाद होने वाली ‘पार्षदों की राजनीति’ करेगी।
