निर्दलीय विधायक की केंद्रीय और प्रदेश भाजपा को खुली चुनौती विधायक कोठारी बोले- ‘सिंबल नहीं, व्यक्तित्व मायने रखता है

भीलवाड़ा/ डॉ. चेतन ठठेरा। शहर विधायक अशोक कोठारी ने आगामी नगरीय निकाय चुनावों को लेकर एक बड़ा बयान देते हुए खुद को भाजपा से बिल्कुल अलग-थलग कर लिया है। विधायक ने स्पष्ट कहा है कि निकाय चुनाव में पार्टी का ‘सिंबल’ नहीं, बल्कि उम्मीदवार का ‘व्यक्तित्व’ मायने रखता है। उनके इस बयान का सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि कोठारी नगर निगम चुनाव में अपनी टीम को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारेंगे। इसे प्रदेश और केंद्रीय भाजपा संगठन के लिए एक खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
व्यापारियों और वैचारिक परिवार से दूरी
विधायक बने 33 माह बीत जाने के बाद कोठारी को अब जाकर उन कार्यकर्ताओं की याद आई है, जिन्होंने उन्हें जीत के शिखर तक पहुंचाया था। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि वैचारिक परिवार और शहर का व्यापारी वर्ग विधायक से पूरी तरह से दूरी बना चुका है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कोठारी के समर्थकों को नगर निगम तक पहुंचाने का बीड़ा अब कौन उठाता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि निर्दलीय विधायक कोठारी अब अपनी राजनीति पूरी तरह से संतों के आशीर्वाद और उनके बल पर चलाना चाहते हैं।
सांसद अग्रवाल और पूर्व विधायक अवस्थी की भूमिका अहम
इस पूरे चुनावी घटनाक्रम में भीलवाड़ा सांसद दामोदर अग्रवाल की भूमिका पर भी सबकी नजरें टिकी हैं, क्योंकि वे भी अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को टिकट दिलाने की जद्दोजहद में लगे हैं। हालांकि सांसद अग्रवाल को विधायक कोठारी के काफी नजदीक माना जाता है, लेकिन फिलहाल टिकट वितरण की राजनीति में पूर्व विधायक विट्ठलशंकर अवस्थी का दबदबा ज्यादा दिखाई दे रहा है। टिकटों का असल बंटवारा किसकी झोली में जाएगा और किसका पलड़ा भारी रहेगा, इसका अंतिम फैसला 31 अगस्त को नामांकन के आखिरी दिन ही होगा, जब निर्वाचन अधिकारी को पार्टी की ओर से सिंबल सौंपे जाएंगे।
सिंबल का महत्व और पिछले बोर्ड का कड़वा सच
विधायक कोठारी ने भले ही कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर भाजपा को एक बार सोचने पर मजबूर कर दिया हो, लेकिन चुनावी रण में असल अहमियत पार्टी सिंबल की ही होती है। अगर पिछले बोर्ड के इतिहास पर नजर डालें, तो भाजपा समर्थित 17 निर्दलीय पार्षद चुनकर आए थे। उस पिछले बोर्ड के कार्यकाल से आम जनता काफी परेशान रही थी, इसलिए अब शहर के मतदाता भी नगर निगम में कुछ नया और बेहतर बदलाव चाहते हैं।
आम आदमी की पहुंच से दूर हैं विधायक
कोठारी के राजनीतिक फैसलों के साथ-साथ उनका सख्त प्रोटोकॉल भी शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। आम आदमी के लिए अपने विधायक से आसानी से मिलना अब लगभग नामुमकिन है। उनके कार्यालय में भी सीधे मुलाकात संभव नहीं है; आम जन को कई ‘दीवारों’ यानी कई स्तर के लोगों से होकर गुजरने के बाद ही विधायक से मिलने का नंबर मिल पाता है। जनता से यह दूरी आगामी चुनावों में क्या गुल खिलाएगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
प्रशासनिक हल्का भी परेशान
निर्दलीय विधायक कोठारी के समर्थकों द्वारा प्रशासनिक कार्यों में दखल और प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों पर दबाव की चर्चा जोरों पर है और इस दबाव से प्रशासनिक हलके के कार्मिक भी परेशान है ।यह चर्चा अक्सर सरकारी कार्यालयों में सुनने को मिलती है।
मेरे बिना नगर निगम में बोर्ड नहीं बन सकता
निर्दलीय विधायक कोठारी द्वारा 33 महीने बाद एक धार्मिक स्थल पर कार्यकर्ता स्नेह मिलन के नाम पर किया गया शक्ति प्रदर्शन करने के पीछे निर्दलीय विधायक कोठारी की मंशा यह दर्शाती है कि मुझे नजरअंदाज करना और मेरे बिना नगर निगम में बोर्ड बनाना भाजपा के लिए एक सपना है।
कहीं यह भ्रम तो नहीं
निर्दलीय विधायक कोठारी द्वारा रविवार को किए शक्ति प्रदर्शन को यह मान ले की उनका यह शक्ति प्रदर्शन कल की चुनाव जीत की गारंटी है तो यह राजनीति का सबसे बड़ा भ्रम है क्योंकि भीड़ और वोट में अंतर होता है। समर्थन और मतदान में अंतर होता है। मंच की तस्वीर तथा मतदान केंद्र की तस्वीर में बहुत अंतर होता है। स्वर्गीय इंदिरा गांधी को स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए लाखों की संख्या में लोगों की भीड़ इकट्ठी होती थी लेकिन दोनों ही दिग्गज नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा यह सबके सामने बड़ा उदाहरण है।
