कार्यकर्ता केवल झंडा उठाने, दरी बिछाना, भीड़ जुटाने और नारे लगाने वाली मशीन है ?

क्या कार्यकर्ता नेताओं के हाथों की कठपुतली है,निकाय चुनाव 2026 ( डॉ. चेतन ठठेरा स्वतंत्र पत्रकार )
कार्यकर्ता केवल झंडा उठाने, दरी बिछाना, भीड़ जुटाने और नारे लगाने वाली मशीन है ?

जयपुर। राजनीति में चुनाव आते ही नेताओं और जनप्रतिनिधियों को कार्यकर्ता याद आने लगते हैं और वह उनकी जी हुजूरी करने लग जाते हैं। उस दौरान इन नेताओं भजन प्रतिनिधियों के लिए कार्यकर्ता एक भगवान के रूप में हो जाता है उसके लिए खाने के नाश्ते की वाहन की सब की व्यवस्था कर देते हैं। उसकी हर मांग मान लेते हैं।

चुनाव आते ही नेता और जनप्रतिनिधि कार्यकर्ता को बताते हैं कि संगठन मजबूत होगा तो राष्ट्र मजबूत होगा, सरकार बनेगी तो संस्कृति बचेगी, सभ्यता बचेगी, देश विश्वगुरु बनेगा। इन सपनों के लिए वह अपना समय, श्रम, पैसा, परिवार और कभी-कभी अपना भविष्य तक दांव पर लगा देता है।

और फिर दर-दर की ठोकरे खाता, दरवाजे पर खड़ा रहता है

लेकिन चुनाव जीतते ही सबसे पहले उसी कार्यकर्ता को किनारे कर दिया जाता है। उसे अगले चुनाव तक रिजर्व में डाल दिया जाता है। फिर मैदान में उतरते हैं दलाल, बिचौलिए और व्यवसायिक लोग, जो नेताओं के इर्द-गिर्द ऐसा घेरा बना लेते हैं कि वर्षों तक संघर्ष करने वाला कार्यकर्ता दरवाजे पर खड़ा रह जाता है।

जिसने धूप में पसीना बहाया, वह पहचान के लिए भटकता है। जिसने रातें जागकर संगठन खड़ा किया, वह एक छोटे से काम के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है। आज कोई एक कार्यकर्ता सीना ठोककर बता दे कि उसका किसी विभाग में बिना पैसे, बिना सिफारिश और बिना चक्कर लगाए काम हो गया हो।

क्या कार्यकर्ता केवल..

कार्यकर्ता केवल जब चुनाव आते हैं तब वह झंडे उठाने दरी पिचाने भीड़ जुटाना और नारे लगाने की मशीन मात्र है इससे ज्यादा और कुछ नहीं और जो कार्यकर्ता नेता की और जनप्रतिनिधि की चमचागिरी करता है मैं मलाई खाता है आम कार्य करता केवल चुनाव में ही याद आता है।

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